लिबास

मेरे कपड़ों में टंगा है तेरा ख़ुश-रंग लिबास!

लिबास

घर पे धोता हूँ हर बार उसे और सुखा के फिर से अपने हाथों से उसे इस्त्री करता हूँ

लिबास

मगर इस्त्री करने से जाती नहीं शिकनें उस की

लिबास

और धोने से गिले-शिकवों के चिकते नहीं मिटते!

लिबास

ज़िंदगी किस क़दर आसाँ होती रिश्ते गर होते लिबास

लिबास

और बदल लेते क़मीज़ों की तरह!

उलझन

एक पशेमानी रहती है उलझन और गिरानी भी आओ फिर से लड़ कर देखें

उलझन

शायद उस से बेहतर कोई और सबब मिल जाए हम को फिर से अलग हो जाने का

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म जैसे जंगल में शाम के साए

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

जाते जाते सहम के रुक जाएँ मर के देखें उदास राहों पर

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

कैसे बुझते हुए उजालों में दूर तक धूल ही धूल उड़ती है!