दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना

सलीम अहमद

दर बदर की ख़ाक थी तक़दीर में हम लिए काँधों पे घर चलते रहे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे

जाँ निसार अख़्तर

फ़िक्र है माह के जो शहर-बदर करने की है सज़ा तुझ पे ये गुस्ताख़ नज़र करने की

मीर तक़ी मीर

क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया उम्र-भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया

वसीम बरेलवी

ठोकर मुझे दर दर की खिला के छोड़ा तक़दीर ने यूँ होश उड़ा के छोड़ा

सिराजुल आरिफ़ीन सिराज

रात गुज़री है दर-ब-दर हो कर ज़िंदगी तुझ से बे-ख़बर हो कर

अहमद सिद्दीक़ी

दर दर फिरते लोगों को दर दे मौला बंजारों को भी अपना घर दे मौला

सलीम रज़ा रीवा

नसीब दर पे तिरे आज़माने आया हूँ तुझी को तेरी कहानी सुनाने आया हूँ

शकील बदायूनी

रुस्वा हुए ज़लील हुए दर-ब-दर हुए हक़ बात लब पे आई तो हम बे-हुनर हुए

खलील तनवीर

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