तू हज़ार बार भी रूठे तो मना लूँगा तुझे मगर देख मोहब्बत में शामिल कोई दूसरा ना हो

तुम शायरी की बात करती हो, मैं तो बातें भी कमाल करता हूँ

कहते थे तुझको लोग मसीहा मग़र  यहां, एक शख्स मर गया तुझे देखने के बाद

दिल की जिद हो तुम वरना, इन आँखों ने बहुत लोग देखे हैं

समझता ही नहीं वो मेरे अलफ़ाज़ की गहराई मैंने हर लफ्ज़ कह दिया जिसे मोहब्बत कहते है

समंदर न सही पर एक नदी तो होनी चाहिए तेरे शहर में ज़िन्दगी कही तो होनी चाहिए

सच्ची मोहब्बत कभी खत्म नहीं होती वक़्त के साथ खामोश हो जाती है

ना आवाज हुई ना तामाशा हुआ, बड़ी खामोशी से टूट गया एक भरोसा तो तुझ पर था

तेरे बाद किसी को प्यार से ना देखा, हमने हमें इश्क का शौक है आवारगी का नही

हर जुर्म पे उठती हैं उंगलियां मेरी तरफ, क्या मेरे सिवा शहर में मासूम हैं सारे

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